| 1 सितंबर 2009
राजीव रंजन
23 अगस्त, 2009, को लंदन का केनिंगटन ओवल मैदान एक ऐतिहासिक शाम का गवाह बना। इस शाम को लोगों ने सिर्फ आकाश में सूरज को डूबते नहीं देखा था, बल्कि मैदान में भी एक सूरज डूब रहा था। क्रिकेट जगत पर ऑस्ट्रेलिया की आधारिक बादशाहत का सूरज। ग्रीम स्वान की गेंद पर जैसे ही एलिस्टेर कुक ने फॉरवर्ड शॉट लेग पर माइकल हसी का कैच लपका, मैदान में मौजूद इंग्लैंड का हर एक प्रशंसक खुशी में झूम उठा।
आखिरी टेस्ट में एंड्रयू फ्लिंटॉफ के लिए इससे यादगार विदाई भला और क्या हो सकती थी। इन यादगार लम्हों को जेहन में संजोए फ्लिंटॉफ की अगुवाई में अंग्रेज खिलाड़ी मैदान के चारों ओर चक्कर लगा रहे थे। अपनी इस ऐतिहासिक जीत का जश्न मनाते हुए। इंग्लैंड ने इंग्लैंड में लगातार दूसरी बार एशेज पर कब्जा किया। शानदार दृश्य था वह।
लेकिन, इस सब के बीच एक और ऐतिहासिक तस्वीर जेहन में चस्पां हो गई। चेहरे पर हताशा की गाढ़ी परत लिए मैदान से बाहर जाते ऑस्ट्रलियाई कप्तान रिकी पोंटिंग की तस्वीर। पोंटिंग के कदम आज से पहले इतने भारी पहले कभी नहीं रहे होंगे। पोंटिंग की इस तस्वीर के रंगों को प्रेजेंटेशन के दौरान कहे उनके इन शब्दों में पढ़ा जा सकता है- ‘यह मेरे जीवन का सबसे हताशा भरा दिन है।’
वैसे, पोंटिंग की हताशा की वजहें थीं। एशेज के इतिहास में इंग्लैंड की जमीन पर दो श्रृंखलाएं गंवाने वाले वे केवल दूसरे ऑस्ट्रेलियाई कप्तान बन गए थे। बिली मर्डोक (1884 और 1890 में) के बाद। इस हार के बाद पहली बार ऑस्ट्रेलिया आईसीसी की टेस्ट रैंकिंग में पहली बार नम्बर एक की कुर्सी से नीचे उतरा। वह भी एक या दो स्थान नहीं, पूरे तीन स्थान। दक्षिण अफ्रीका, श्रीलंका और भारत से नीचे चौथे नंबर पर।
एशेज की हार ने पोंटिंग और उनकी रणनीति को सवालों के घेरे में लाकर खड़ा कर दिया है। ऑस्ट्रेलियाई मीडिया और कुछ पूर्व ऑस्ट्रेलियाई खिलाडि़यों की नजर में पोंटिंग की कप्तानी ने टीम को कमजोर किया है। पूर्व ऑलराउंडर ग्रेग मैथ्यूज उन्हीं में से एक हैं। हालांकि, पोंटिंग के समर्थन में इयान चैपल और कई पूर्व ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ी व क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया के अध्यक्ष जेम्स सदरलैंड आगे आए हैं और उन्हें अपने टीम के खिलाडि़यों का भी समर्थन मिला है। लेकिन, इसमें कोई शक नहीं कि इस हार ने पोंटिंग को भीतर से हिला दिया है। यही वजह है कि वे कप्तानी की जिम्मेदारी बांटने की बात भी करने लगे हैं।
पोंटिंग ने अब तक कुल 61 मैचों में ऑस्ट्रेलिया की कमान संभाली है, जिसमें से उन्होंने 39 टेस्ट जीते हैं, 11 हारे हैं और 11 ड्रॉ रहे हैं। लेकिन, यह बात सिर्फ तस्वीर का सिर्फ एक पहलू दिखाती है, यहां तस्वीर का दूसरा रुख भी है। साल 2008 और 09 में ऑस्ट्रेलिया ने पोंटिंग की कप्तानी में खेले 23 टेस्ट मैचों में से 9 में जीते हैं, 8 मैचों में उसे हार मिली है, 6 मैच ड्रॉ रहे हैं। यानी कि 2008-09 से पहले पोंटिंग ने अपनी कप्तानी के 38 टेस्ट मैचों में से 30 जीते थे और सिर्फ 3 हारे थे। यह आंकड़े अपने आप में इस बात की तस्दीक करते हैं कि दो साल पहले तक जो ऑस्ट्रेलियाई टीम अजेय नजर आती थी, आज उसे हराना मुश्किल नहीं है। विश्व क्रिकेट की बादशाह ऑस्ट्रेलियाई टीम आज एक सामान्य सी टीम नजर आ रही है। तो बात साफ है, पोंटिंग की कप्तानी पर उठ रहीं उंगलियां बेवजह नहीं हैं।
वैसे भारतीय क्रिकेटप्रेमी इस बात पर खुश हो सकते हैं कि ऑस्ट्रेलिया के इस वर्तमान पतन के पीछे टीम इंडिया का भी बहुत बड़ा योगदान है। याद कीजिए जनवरी 2008 के पहले हफ्ते में सिडनी में हुए बॉर्डर- गावस्कर सीरीज के दूसरे टेस्ट को। कंगारुओं ने एक के बाद एक गलत फैसलों की बदौलत भले ही ये टेस्ट जीत लिया, लेकिन रिकी पोंटिंग और उनकी टीम को खराब खेल भावना के कारण अपने देश सहित पूरी दुनिया में तीव्र आलोचनाओं का सामना करना पड़ा। दुनिया की सबसे तेज विकेट मानी जाने वाली पर्थ की विकेट पर भारत ने ऑस्ट्रेलिया को 72 रनों से हराया। टीम इंडिया के इस जवाबी हमले ने कंगारुओं को चौंका दिया। और, अब एशेज की हार बाद कंगारु इस सिंहासन से आधिकारिक रूप से बेदखल कर दिए गए हैं।
लेकिन, पोटिंग की मुश्किलें केवल इतनी ही नहीं है कि वे एशेज दो बार हार गए या ऑस्ट्रेलिया की बादशाहत समाप्त हो गई। दरअसल, उनके लिए असली समस्या आगे आने वाले दिनों में शुरू हो सकती हैं। अगर ऑस्ट्रेलियाई टीम अपनी आगामी टेस्ट श्रृंखलाएं हार जाती है, तो पोंटिंग की कप्तानी खतरे में आ सकती है। और, ऑस्ट्रेलियाई टीम के पिछले 20-25 सालों के इतिहास को देखें, तो कप्तानी से हटने के बाद टीम से भी विदाई लगभग तय हो जाती है। एलन बोर्डर, मार्क टेलर और स्टीव वॉ इसके उदाहरण हैं। हम उम्मीद करते हैं कि पोंटिंग के साथ ऐसा नहीं होगा। |